जानिए शांति पाठ का अर्थ और महिमा
जब भी हम कोई कार्य आरंभ करते हैं, तो ईश्वर से प्रार्थना करतें है कि वह कार्य निर्विघ्न पूर्ण हो, इसके लिए गणेशजी जिन्हें विघ्न विनाशक कहा गया है, की पूजा करके मंगलकामना करते है। इसी तरह प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान के आदि में वातावरण की शुद्धि के लिए शांति पाठ करना आवश्यक होता है।
ऊँ द्यौः शांतिरन्तरिक्षं शांतिः पृथिवी शांतिरापः शांतिरोषधयः शांति।
वनस्पतयः शांतिर्विश्वे देवाः शांतिब्र्रह्म शांतिः शांतिरेव शांतिः सा मा शांतिरोधि।।
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥
अर्थात् द्यूलोक में शांति हो, अंतरिक्ष में शांति हो, पृथ्वी शांत हो, जल शांत हो, औषधियां और वनस्पति शांति देने वाली हो। सभी पदार्थ सुसंगत और शांत हो, ज्ञान में शांति हो, विश्व की प्रत्येक वस्तु शांति युक्त हो। सर्वत्र शांति हो, वह शांति मुझे भी प्राप्त हो। इस पाठ से प्रार्थना करने पर मन शांत होता है।
यजुर्वेद के इस शांति पाठ मंत्र के जरिये साधक ईश्वर से शांति बनाये रखने की प्रार्थना करता है। विशेषकर हिंदू संप्रदाय के लोग अपने किसी भी प्रकार के धार्मिक कृत्य, संस्कार, यज्ञ आदि के आरंभ और अंत में इस शांति पाठ के मंत्रों का मंत्रोच्चारण करते हैं। वैसे तो इस मंत्र के जरिये कुल मिलाकर जगत के समस्त जीवों, वनस्पतियों और प्रकृति में शांति बनी रहे इसकी प्रार्थना की गई है
